लुटती विरासत- कुठाराघात आस्था पर

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कावेरी के तट पर एक छोटा सा गाँव श्रीपुरंतन है। यूं तो ये भी एक आम गाँव ही है यहां राजाराजा चोला निर्मित एक मंदिर प्रांगण है,जिसपर इस गाँव के लोगों को बहुत गर्व है। इसकी कहानियाँ बड़े गर्व से सुनाते हैं गाँववाले। 9 वीं शताब्दी में चोला साम्राज्य ने अनेक मंदिरों का निर्माण किया, जिनमें से एक ये श्रीपुरंतन मंदिर है।

2006 तक इस मंदिर की चर्चा बस आस-पास के क्षेत्रों तक ही सीमित थी,पर एक घटना ने इस मंदिर को विश्वपटल पर ला खड़ा कर दिया । यहाँ स्थापित बेशक़ीमती नटराज की मूर्ति मंदिर से चोरी कर भारत से बाहर तस्करी कर भेज दिया गया। तारीफ़ तो ये कि
१) इसे US$ 5 million यानी क़रीब तैंतीस करोड़ जैसी भारी-भरकम राशि में बेचा गया
२) इसे एक सरकारी संस्थान National Museum of Australia ने ख़रीदा

विश्वप्रसिद्ध 'नटराज' की मूर्ति की सुध लेने वाला कोई नहीं था भारत में । पर 2013 में 'India Pride' नामी कुछ कलाप्रेमियों के संगठन ने खोजबीन शुरू की, मूर्ति को पहचाना और क़वायद शुरू की इसकी वापसी की । ज़ाहिर है ये इतना आसान नहीं था । इस ग़ैर सरकारी संस्था के सदस्यों ने पुरातात्विक तस्वीरों, काग़ज़ के उपलब्ध प्रमाणों , वृत्तचित्रों द्वारा जुटाई हर छोटी से बड़ी जानकारियों की मदद से व उनके हर तरह के अपने और पब्लिक के 'साम-दाम-दंड-भेद' वाले लगातार प्रयासों से दिन-रात एक कर दिया ताकि देश की अनमोल विरासत 'नटराज' वापस मिल सके। 2013 के मध्य तक हर कोशिश एक अंतहीन दिशा की ओर जा रही थी । 

पर 2013 के अंत तक कोशिशें रंग लाईं और ऑस्ट्रेलिया सरकार 'नटराज' प्रतिमा को वापस करने पर राज़ी हो गई। पर वापसी की ये राह इतनी आसान नहीं थी। भारतीय अधिकारियों ने इस मूर्ति को वापस लेने से मना कर दिया ।हाँ !! सच सुना आपने !! बग़ैर सरकारी मदद के कुछ लोगों की जद्दोजहद से देश की अमानत जब वापस मिलने को हुई तब ऑस्ट्रेलिया में भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने इस दरख्वास्त पर कोई तव्वजो ना दे इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। भारत की ये अनमोल विरासत शिव की 'नटराज' मुद्रा वाली विश्वविख्यात प्रतिमा सरकारी लालफ़ीताशाही की शिकार हो गई।

अब सवाल उठता है कि क्या 'नटराज' की ये प्रतिमा भारत आई या नहीं ?? जवाब है आई तो ज़रूर, पर कुछ इस तरीक़े से जो हमने सोची भी ना हो । कहानी का दिलचस्प मोड़ ये है कि ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी एबॉट सितंबर 2014 के अपने भारत दौरे पर ये बहुमूल्य प्रतिमा अपने साथ लाये और ससम्मान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट किया । ताज्जुब के साथ कि भारतीय अधिकारियों ने इसे वापस ले जाने मे कोताही क्यूँ बरती ।

बहुत पुराना है ये लूट का सिलसिला

सालों से भारत की अनमोल कलाकृतियों की लूट का सिलसिला जारी है। 'नटराज' प्रतिमा की चोरी भी एक नई कड़ी थी बस। हाल ही में अमेरिकी सरकार ने भारत से तस्करी की गई  $100 million की क़रीब 2500 पुरातात्विक कलाकृतियों को ज़ब्त किया है। ये तो इस काले कारनामे की एक बानगी भर है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत से चुराई गईं हज़ारों अनमोल कलाकृतियों में से क़रीब 10000 आसानी से खोजकर वापस लाये जा सकते हैं।
लूटने वाले ने तो बस बाज़ार में इसकी क़ीमत लगाई और बेची, पर भारतवासियों के लिये ये उनकी संस्कृति की धरोहर है, उनकी आस्था का प्रतीक है, अखंड विश्वास है.. जिसकी कोई क़ीमत नहीं । मंदिर सिर्फ़ इतिहास की धरोहर नहीं, सामाजिक मेल-मिलाप व सौहार्द स्थल होते हैं। जन्म से मृत्यु पर्यंत मंदिर हमारे जीवनशैली के अहम अंग हैं। मंदिर से भगवान की प्रतिमा का हरण हमारे जीवन से ह्रदय निकाल देने सरीखा मर्मांतक होता है।  

(http://bit.ly/IPPvideo).

सरकारी उदासीनता ?

शिकागो यूनिवर्सिटी ने नई दिल्ली में 'The Past for Sale: Protecting India's Cultural Heritage' विषय पर एक सेमिनार की,जिसमें देश-विदेश से जाने-माने इतिहासकार,शिक्षाविद,कला प्रेमी,पुरातत्ववेत्ता और पत्रकार सम्मिलित हुए। पर सांस्कृतिक मंत्रालय व भारतीय पुरातत्व विभाग की अनुपस्थिति बरसों से इस ओर सरकारी तंत्र की उदासीनता की तस्वीर बयां कर जाती है। ये दुराव कई प्रश्न खड़े कर जाता है :

१) भारत के विरासत की फ़िक्र दूसरे देश करें पर हम मौन तमाशा देखें,क्यों ?
२) कला-माफ़िया के लिये भारत आसान लक्ष्य,क्यों ?
३) कलाकृति व विरासत संजोने में हमारा सरकारी-तंत्र इतना अकर्मण्य क्यों ?
४) 'India Pride' जैसी ग़ैर सरकारी संस्था को हमारे भगवान की घर वापसी की जद्दोजहद करनी पड़ती है,क्यों?
५) भारत में ग़ायब हो रही विरासत को संजोने के लिये कोई सशक्त ढाँचा नहीं , क्यों ?

भारतीय विरासत को संजोने में कोताही क्यों ?

भारतीय सरकारी तंत्र की बरसों से चली आ रही उदासीनता से लुप्त हो रही विरासत को कैसे बचायें ?
एक सशक्त व उत्तरदायी तंत्र बने जिसके लिये कुछ अहम सलाह हैं :
१) विरासत संजोने का मौक़ा मिले नागरिकों को : कलाप्रेमी व जानकारों को विरासत के दस्तावेज़ों व कलाकृतियों की रख रखाव का मौक़ा मिले
२) कला तस्करों से बचायें विरासत : कला संरक्षण के लिये समृद्ध कोष बने व बेशक़ीमती संग्रहों की कड़ी निगरानी हो I
३) तस्करों पर कठोर कार्रवाई हो : 'भारतीय विरासत संरक्षा' नाम से एक सुरक्षा इकाई बने,जिसके व्यापक अधिकार हों ।

अनेक छोटे देशों ने ये बना रखा है ,फिर भारत पीछे क्यों रहे ?

बेहद सरल सा सवाल है - अरसे से भारतीय राजनेताओं और अफ़सरशाही की उदासीनता ने हमारी अनेक अनमोल विरासतों से हमें महरूम कर दिया है। पर इस नई उम्मीदों वाले भारत में
"क्यूँ ना करके हिफ़ाज़त, बनाये नव भारत " की मंशा से आगे बढ़ें हम ।
बड़ा सवाल ये है कि - भारत की विरासत संजोने में मोदी सरकार के बढ़ते क़दम सही दिशा में है ? क्या इतिहास उन्हेंभारत के विरासत संजोने वाले प्रधानमंत्री के रूप में देखेगा ?इन सवालों के जवाब तो भविष्य के गर्भ में है पर उनकी अटल इच्छाशक्ति,भारतीय परंपरा के प्रति अद्भुत लगाव देख नित नई आशा जगती है कि भारत के विरासत के साथ-साथ उज्जवल कल सुरक्षित है।

 

Hindi Translation: जया रंजन @JayaRjs

Author: Anuraag Saxena (https://twitter.com/anuraag_saxena) is the Regional CEO with World Education Foundation,UK. He is passionate about Indian heritage and culinary-history. He is based in Singapore.

View expressed here are of the Author.

 

 

 

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