ढोंगी मीडिया

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समाज की तरक़्क़ी में निष्पक्ष और संतुलित मीडिया का बेहद अहम योगदान होता है, पर क्या करें तब, जब समाज के इस मज़बूत स्तंभ को ही घुन लग जाये। चेहरों पर ‘लिबरलपने’ की नक़ली मुस्कान ओढ़े, इनके हर मंतव्य में समाज का हित नहीं,बल्कि स्वहित छुपा होता है। किसी भी ख़बर को पहले ये अपनी बनाई तराज़ू पर रखते हैं, फिर दूसरी तरफ़ धर्म व जाति की बाट चढ़ाते हैं। ख़बर पर मिलकर चीख़-पुकार तभी मचाते हैं, जब इन ख़बरों का मसौदा इन पलड़ों पर भारी पड़ता है। आज कुछेक को छोड़कर ज़्यादातर मीडिया घराने सोची-समझी साज़िश के तहत ख़बरों को परोसते हैं। तभी ढोंगी बाबाओं की तरह इन ढोंगी मीडिया की बात कोई सुनता नहीं,कोई मानता नहीं ।

ढोंगी मीडिया के बड़े पैंतरे हैं, इनका मानना है कि जो ये कहें लोग शीश नवाकर इनकी बात मानें । ये अपने को परम ज्ञानी समझते हैं कि इनके सामने दूसरा कोई ठहर ही नहीं सकता। कुछेक बरस पहले इनका भी जमा-जमाया कुनबा हुआ करता था। सरकार कोई फ़ैसला करे, तो उनके सहयोगियों से पूर्व इन्हें सब पता होता था। सरकार के फ़ैसलों तक में इनके स्वार्थ सिद्धी हुआ करती थी । पर जैसा कि हरेक ढोंगी बाबा का हश्र होता है, इनके भी दुख भरे दिन आये। लोग जागरूक हुए, लंपटों की सरकार को चलता कर दिया गया, तो इन बेचारों के पेट पर ज़ोरदार लात पड़ी । ये बिलबिलाए, बौखलाये..अपनी ज़हरीली बातों से समाज के दो-फाड़ करने का कोई मौक़ा चूकते नहीं।

गौरी लंकेश की निर्मम हत्या के बाद, मिनट भी नहीं बीते होंगे कि राज्य सरकार की बजाय भाजपा सरकार पर अपने निहित स्वार्थ तले ऊँगलियाँ उठानी शुरू कर दी । क़ानून -व्यवस्था की पूरी कमान राज्य सरकार की होती है, तो राज्य की सिद्धारमैया की सरकार की पूरी जवाबदेही बनती है। पर शायद ही इस बौखलाये दोगलेपन की शिकार मीडिया गैंग ने सिद्धारमैया सरकार से जवाब तलब की हो ।प्रदेश की राजधानी में पत्रकार की निर्मम हत्या हो तो क्या इसे राज्य की क़ानून-व्यवस्था की ख़राब हालत का उदाहरण न माना जाये ? हर घटती घटना के लिये इन्हें मोदीजी का वक्तव्य चाहिये, पर कांग्रेसियों का नाम आते ही इनके मुँह में दही जम जाती है । गौरी के भाई इंद्रजीत लंकेश खुलकर बता रहे हैं कि उन्हें नक्सलियों की धमकियाँ मिल रही थीं, पर ये बड़ी चतुराई से इस बात को गौण कर पूर्व-नियोजित सवाल कर रहे हैं । मतलब बिलकुल साफ़ है कि गौरी लंकेश के हत्यारों को सज़ा मिले, उससे इन्हें कुछ ख़ास लेना-देना नहीं है। बस अपनी बंसी बजाये जा रहे है। बड़ी तेज़ है इन ढोंगी मीडिया की तहक़ीक़ात की गति, क्योंकि ये “सत्य आधारित”नहीं, पूर्व-निर्धारित “मत आधारित” है, जहाँ गवाह भी यही, वक़ील भी यही और जज भी यही । बेहद शर्मनाक !!

कर्नाटक में ही पिछले दो बरस में क़रीब 12 RSS-BJP-VHP कार्यकर्ता मारे गये हैं, पर कोई आवाज़ नहीं उठाई गई । केरल में तो लेफ्टिस्टों ने कुछ सालों से मौत का तांडव सा मचा रखा है, पर किसी की मरी हुई चेतना नहीं जागती । कोई वहाँ के मौत के ख़ूनी खेल पर नक़ली “सहिष्णुता ” दिखाते हुए भी विलाप नहीं करता। बिहार में राजद के परम-प्रिय सहयोगी शहाबुद्दीन ने राजदेव सिंह की निर्मम हत्या करवाई तो बस एक खाना-पूर्ति सी कर सब अपने दड़बों में सिमट गये। लालू से बड़ा पुराना याराना जो है इनका । यूपी के पत्रकार जागेंद्र सिंह को मंत्री राम-मूर्ति वर्मा के भेजे पुलिस और गुंडों ने ज़िंदा जला दिया, पर इन दोगली मीडिया ने कितना हंगामा किया ? राजेश वर्मा (IBN7) 7 Sep 2013 मुज़फ़्फ़रनगर यूपी, संजय पाठक 13 Aug 2015 फरीदपुर यूपी, हेमंत यादव 3 Oct 2015 चंदौली यूपी और राम चंदर छत्रपति (पूरा सच) सिरसा हरियाणा – लंबी फ़ेहरिस्त है उन पत्रकारों के नामों की, जिन्हें असमय काल कवलित कर दिया गया। पर तब इन ढोंगी मीडिया की नज़र भी शायद ही पड़ी हो इन घटनाओं पर ।  इन घटनाओं को खाना-पूर्ति के तहत बस एक कोने में जगह देकर हाशिये पर धकेल दिया गया ।

ये आउटरेज की सुविधा भी साधारण मीडियाकर्मियों के लिये नहीं, बल्कि तथाकथित ‘सभ्य ल्यूटियन्स ‘ के लिये है। अपनी पसंदीदा सरकार के शासन में घटने वाली निर्मम हत्याओं से नज़र फेरने की कला में माहिरता हासिल है इन्हें।

तुर्रा तो ये कि बड़ी आतंकवादी घटनाओं को धर्म के चश्मे से ना देखने का घुट्टी पिलाने वाले इन ढोंगियों की पोल तब खुल जाती है, जब बिना सबूत, किसी भी घटना को “हिंदुत्व ” के चश्मे से देख “हिंदुत्व पॉलिटिक्स “,”भगवा- टेरर” जैसे शब्दों को साज़िशन गढ़ अपनी सड़ी -गली सोच से समाज को दूषित कर देते हैं। देश को रंगों में बाँटने का महापाप किया है इन सबने । पर इन्हें शायद पता नहीं कि “स्वच्छ भारत” के अभियान के तहत लोगों ने कचरा साफ़ करने की आदत डाल ली है। कितने ही ढोंगियों की पोल आये दिन खुलती रहती है । इनके हर वक्तव्य की पोल इनके ख़ुद के लिखे दूसरे वक्तव्य ही खोल डालते हैं। इनके मौक़ापरस्त हरकतों की अब पूरी फ़ेहरिस्त रखते हैं लोग ।

ये सब गिद्ध की मानिंद अपनी दावत की जुगाड़ देख मौत पर ख़ुश हो मौक़े भुनाते हैं। कोई श्रद्धांजलि देते- देते अपनी फ़्लॉप किताब की मार्केटिंग कर लेता है तो कोई अपनी कसौटी पर खरा उतरने वाले मौत पर रूदाली सा ही विलाप करते हुए शोकग्रस्त हो स्क्रीन तक काला कर लेता है । ढोंगी मीडिया मौत-मौत का फ़र्क़ करने में माहिर हो गये हैं। इन विलाप के पीछे इनका मक़सद पूरा जो हो जाता है। पर आज लोग  जागरूक हो गये हैं, इनकी नस-नस से वाक़िफ़ हो चुके हैं। समय है इनके नक़ली चेहरों की हर परत को उधेड़ दिया जाये । मौत किसी की भी हो, दुखद घटना है, जिसकी निष्पक्ष जाँच हो, व गुनहगारों को सख़्त सज़ा मिले। हर गुनाह जनता के सामने निष्पक्षता से आये, जिसके लिये सशक्त एवं सुलझी पत्रकारिता हो । दोगलेपन की शिकार मीडिया पर नकेल कसी जाये, क्योंकि जनता बेलाग सच जानना चाहती है । इसलिये ज़रूरी है कि पत्रकार बनें रहें सिर्फ़ पत्रकार, ना कि बनें पक्षकार ।

 

जया रंजन @JayaRjs

 

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