जाति के फेर में,रह गया बिहार अंधेर में

Tweet about this on TwitterShare on FacebookShare on Google+Share on LinkedIn

‘बिहार’ जहाँ बौद्ध धर्म की उत्पत्ति,प्रचार व प्रसार की शुरूआत हुई। कई बौद्ध विहार व स्तूप बने और “विहार” का अपभ्रंश “बिहार” हो गया। भौगोलिक रूप से गंगा के मध्य मैदान के बड़े हिस्से में फैली सपाट और समतल भूमि है ये। हिमालय से गंगा,कोसी व अमरकंटक से सोन जैसी नदियों ने अपने जल से सिंचित कर हरीतिमा की चादर इस धरा पर पसार रखी है।गौतम बुद्ध,महावीर,गुरू गोविंद सिंह जी सरीखे दिव्य महापुरूषों की धरती है ये। सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाकर न्याय ,सुशासन एवं जन-कल्याण के नये मानक स्थापित किये।

विगत कुछेक दशकों से ‘बिहार’ ने अपनी गरिमामय पहचान कहीं खो सी दी ।आज ‘बिहार’ पर्याय बना है कुशासन,भ्रष्टाचार ,गुंडागर्दी ,अपहरण एवं सरकार के आकाओं की शह पर पलते तमाम तरह के अपराध के गढ़ का।शरीफ़ लोग घरों में दुबकते रह गये और अपराधी बेख़ौफ़ जेल तक से शासन चलाते रहे। रसूखदार होना बेहद अहम हो गया चैन से जीने को।

लेकिन वो ‘बिहार’ जब हर दूसरे घरों के शिक्षित,अपनी मेहनत से उच्च-पदों पर आसीन होते लोग, वो महिलाएँ जिनका प्रिय शग़ल पढ़ना-लिखना होता था,वे बच्चे जो देश के बेहतरीन स्कूल-कॉलेजों में चुने जाते थे.. सहसा चले कहाँ गये ?? जवाब है-अपनी जड़ों से दूर,देश के किसी और प्रांत में…। पर क्यूँ –???

जवाब

कुछेक दशक पूर्व बिहार में लालू यादव बड़ी तेज़ी से उभरे,पर बिहार को जातिगत समीकरण में बाँटकर । बड़े खुले अंदाज में उन्होंने यादव वोट बैंक को एक करने के लिये नारा दिया-“भूरा बाल साफ़ करो”। यहाँ भू- भूमिहार,रा-राजपूत,बा-बामन(ब्राह्मण), ल- लालाजी (कायस्थ) । अपने ठेठ गँवई अंदाज में वो समाज में यादव ध्रुवीकरण करते गये,कई क्षेत्रों में दंगे करवा गये और मीडिया के कंधे पर सवार होके मुख्यमंत्री बन गये। शासन में आते ही अपने नाते-रिश्तेदारों को लूट की खुली छूट दे दी और ख़ुद भी “चारा” चरने में व्यस्त हो गये। बिहार आगे बढ़ने के बजाय गर्त में गिरने लगा,पर हमारी मीडिया तो उनके बेहूदे,बेसिरपैर के भाषणों पर दोहरी होती रही । जिसने भी आवाज़ उठानी चाही, उस आवाज़ को सदा के लिये बंद कर दिया गया। कितने व्यापारी हफ्तावसूली के फेर में मारे गये।जो बचे वो किसी तरह अपना व्यापार समेट भाग निकले।आये दिन बच्चों के अपहरण से त्रस्त लोग नौकरी बदल या तबादला ले चले गये। जो एक बार निकल गये वो लौट के नहीं आये।

हर बार जब कहीं किसी कोने में कोई सिरफिरी आवाज़ गूँजती है- “बिहारियों” को बाहर करो.. । तब अपमान की पीड़ा हर बिहार वासी को बींध कर रख देती है।

जब अराजकता चरम पर पहुँच गई और “चाराकांड” में लालू को जेल जाना पड़ा तब लालू ने “राबड़ी देवी” सरीखी अनपढ़ महिला को राज्य की कमान सौंप दी। तमाम पढ़े-लिखे लोग कसमसाते रह गये पर ये “वोटबैंक” जो ना करवाये। तुर्रा तो ये कि ये “वोटबैंक ” आज भी बदहाल ही है,पर ये जातिगत घुट्टी अब रग-रग में बसती है।

पिछले चुनाव में आस सी बंधी,कि शायद इस बार “बिहार” इस जाति-पाँति के फेर से निकल मुख्यधारा में जुड़ेगा।

पर हुआ वही ढाक के तीन पात…वही जातिगत प्रलाप ..वही अराजकता की जीत..वही “बिहार” की हार ।

क्यूँ हम “बिहार” को उसका गौरव वापस नहीं कर सकते ? क्यूँ हम प्रवासी ” बिहारी” को उसका मान वापस नहीं कर सकते ? क्यूँ हम एक होकर जाति-भेद मिटा नहीं सकते ? कब तक चाराचोरों को वोट देकर जहालत भरी ज़िंदगी जीते रहेंगे ? कब तक हमारे मज़दूर दर-दर भटक अपनी मेहनत से भरपूर फ़सल उगायेंगे और गाँव में दो जून की रोटी तक को तरसते रह जायेंगे ?

जवाब जिस दिन सबने मिल ढूँढ लिया, “बिहार” अपना खोया गौरव वापस पा लेगा।

जया रंजन

@JayaRjs

 

View expressed here are of the Author. Feedback can be given as responses to the article.

Related posts

Leave a Comment