चुनावी समर में चर्च का तुग़लक़ी फ़रमान

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चुनाव की आहट होते ही जनता की बारी आती है अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के कामों की मीमांसा कर, सही को फिर से मौक़ा देने की और गये-बीतों को बाहर का रास्ता दिखाने की। मगर जिन दलों का पूरा कच्चा-चिट्ठा खुल चुका हो, उनके पास एक बड़ा आज़माया हुआ रास्ता है; धर्म को भुनाने का मार्ग। ले देके यहीं तो शरण मिलती आई है उन्हें।

जब परिवार की दी गई दुहाई काम ना आई,

तो याद इस दर की उन्हें सदा है आई।

धर्म के तथाकथित आकाओं का एक तुगलकी फ़रमान जारी होता है और बेचारी धर्मभीरू जनता को ढोर की तरह हाँकते हुए फिर उसी निरंकुश शासक के रहमोकरम पर छोड़ते आये हैं सदैव ये धर्म के ठेकेदार ।

गुजरात चुनाव के प्रचार में जब कांग्रेस ने हर पैंतरे आज़मा लिये और जनता का कोई रुझान तक नहीं दिखा, तब आया मारक धर्म का दाँव। आर्क बिशप का खुला पत्र:

यहाँ इनको चुनाव के दौरान वाला ‘डर’ लग रहा है, जो मौसमी बुखार की तरह इन्हीं समयों पर आता है। इनके अनुसार मानवता ख़तरे में है, इनके संवैधानिक अधिकार को रौंदा जा रहा है, बिना नागा चर्च, चर्च के अधिकारियों और संबंधित लोगों पर प्रतिदिन हमले हो रहे है। लोग डर और दहशत में हैं, इससे पहले कि राष्ट्रवादी लोग देश पर क़ब्ज़ा कर लें, इन्हें एक होना होगा।

सोशल मीडिया के ज़माने में जहाँ एक मामूली बात भी छिपी नहीं रह सकती, ये रोज़-रोज़ कहाँ इनपर हमले होते हैं? ये सवाल ज़हन में उठना लाज़िमी है। ऐसी ही बातें दिल्ली में चुनाव से ऐन पहले भी उठी थी, जब कुछ गुंडा-तत्वों ने चुनावी मुद्दा बनाने हेतु चर्च पर हमले किये, जो चुनाव होते ही शांत हो गये। तफ्तीश में यह साबित भी हो गया कि ये गुंडई के मामले थे ना कि धर्म पर हमला । लेकिन इन हमलों को इस भ्रामक तथ्यों तले प्रचारित किया गया कि राष्ट्रवादी ताक़तें धर्म के नाम पर हमले कर रही हैं, धर्मनिरपेक्षता खतरे में है और मोदी सरकार इसे अनदेखा कर रही है। ताकि मोदी सरकार की भद्द पूरी दुनिया में पिटे और हुआ भी कुछ ऐसा ही। अंतराष्ट्रीय मीडिया ने भी इस मसले पर इनके परोसे समाचार को चलाया। इन्हें देश की विश्व पटल पर होती झूठी बेइज़्ज़ती तक का फ़र्क़ नहीं पड़ता । बस धर्म के नाम पर लामबंदी करना मक़सद होता है।

इस बार इन्होंने तो कुछ ज़्यादा ही बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाकर धार्मिक भावनायें भड़काईं हैं, ताकि लोग धर्म के चश्मे से चुनाव देखें। ऐसा ही गोवा चुनाव के दौरान आर्कबिशप फ़िलिप ने क्रिसमस मास प्रेयर में लोगों को खुलकर कहा था कि वो ‘अपने लोगों‘ को वोट करने में उनकी सहायता करेंगें। 2014 के आम चुनावों के दौरान शाही इमाम ने भी कांग्रेस के पक्ष में वोट करने की खुली अपील की थी।

ज़ाहिर सी बात है ‘राष्ट्रवाद‘ शब्द को इनलोगों ने नीचा बनाकर छद्म धर्मनिरपेक्षता का नक़ाब ओढ़ देश को बस खोखला ही किया है।

निष्कर्ष यही निकलता है कि अगर आप सिर्फ़ वोट करने की अपील भर कर दें, जैसा कि श्री श्री रविशंकर ने किया था, यही सेक्यूलर लोग हाथ धोकर उनके पीछे पड़ जायेंगें। जैन लोगों ने पर्यूषण के दौरान नौ दिन माँस के दुकानों को बंद रखने की गुज़ारिश की, तो इन्हीं सेक्यूलरों की जमात ने क्या हल्ला मचाया था।

आर्कबिशप के अनुसार राष्ट्रवाद से उनका आशय “narrow minded” से है। राष्ट्रवाद से इनको बेहद आपत्ति है, तो फिर राष्ट्रद्रोह के बारे में क्या ख़्याल है? भाजपा समर्थकों के लिये राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग एक कोडिंग की तर्ज़ पर कर धार्मिक लामबंदी की जा रही है। अगर राष्ट्रवादी होना अपराध है तो फिर राष्ट्रद्रोही होना बड़े सम्मान की बात होगी इनके मतानुसार ।

जिस धर्मनिरपेक्षता के बड़े-बड़े तमग़े लगाकर ये बड़ी शान से ये घूमते हैं, कभी उसके सही मायने भी जानने की कोशिश भी की है।

गांधीजी के अनुसार; धर्मनिरपेक्षता का अर्थ - सर्व धर्म समभाव है !!

ये चर्च जिस यूरोप की पैरोकारी करते हैं और आँख मूँदकर जिनका अनुसरण करना अपना परम धर्म समझते हैं, कभी उनके ‘सेक्यूलरिज्म’ के सही अर्थ को जाना है ? यूरोप में सेल्यूलरिज्म उन सिद्धांतों को कहते हैं जो सरकार और धर्म को विधिसम्मत रूप से अलग करे। धार्मिक मसलों, आस्था और विश्वास को राजनीति से परे रखे। धर्मनिरपेक्षता की अभिव्यक्ति तभी सार्थक होगी जब कोई भी राजनीतिक फ़ैसला धर्म और धार्मिक विश्वासों से दूर होगा। चर्च सिर्फ सामाजिक मसलों से सरोकार रखे। अगर सही मायनों में इन अर्थ को जाना भी होगा तो जानकर अनदेखा करते होंगे, क्योंकि तब धर्म के नाम पर इस तरह राजनीति के खेल में अपने पैंतरे कैसे दिखायेंगें ?

गांधीजी के देश में उनकी ही तो सुन लीजिये । धार्मिक विद्वेष फैलाने की जगह लोगों के बीच आपसी सद्भावना बढ़ाने की सोचिये। यूरोप से प्रभावित हैं तो धर्म को राजनीति से परे ही रखिये। लोगों को धार्मिक शिक्षा दीजिये, बाक़ी अपनी विवेक-बुद्धि का सही इस्तेमाल देश-हित में करने दीजिये। और सबसे बड़ी बात ‘राष्ट्रवाद’ एक बेहद व्यापक सोच वाला देशप्रेम से ओत-प्रोत शब्द है, इसकी महत्ता को कम आँकने की भूल ना कीजिये। चुनावी समर से धर्म जितनी दूर रहे, चुनाव निष्पक्ष और धर्म सबल रहेगा। इन छ्द्म धर्मनिरपेक्ष लोगों के कृत्यों के ख़िलाफ़ समाज को एक हो पुरज़ोर जवाब देना होगा। उम्मीद है चुनाव आयोग संज्ञान ले देश को तोड़ने वालों की साज़िश पर नकेल कसे।

Jaya Ranjan @JayaRJS

Associate Editor - Hindi. Bharat Samvad

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