मज़ाक़ बनाते नहीं, ख़ुद बनते ये नेता

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ज़ुबान ज़रा सी फिसली और अर्थ का अनर्थ हो जाता है। कभी-कभी ये जाने-अनजाने हो जाये तो फिर भी समझा जा सकता है, पर आजकल राजनीति में इसकी मनमुताबिक आजमाइश ज़ोर-शोर से हो रही है। जबसे बरसों से जमी-जमाई राजनीति की दुकान पर पब्लिक ने ताला सा जड़ दिया है, हर दूसरे राजनेता ने अपनी ढफली अपना राग बजाना शुरू कर दिया है यहाँ अपने को मार्केट में बनाये रखने की ख़ातिर। बेहद आसान है, सरकार के विरोध करने के लिये बस कुछ ना कुछ अनर्गल कहना ।

इसी का एक बेहूदा नमूना देखने को तब मिला, जब शशि थरूर ने मिस वर्ल्ड बनी भारतीय सुंदरी मानुषी छिल्लर के उपनाम का मज़ाक़ बनाते हुए मोदी सरकार की नोटबंदी पर तंज कस दिया कि “नोटबंदी से कितनी ग़लती हुई। भाजपा को समझना चाहिए कि भारत की नकदी दुनिया में श्रेष्ठ है। यहां तक कि हमारे ‘चिल्लर’ तक को विश्व सुंदरी का खिताब मिल गया."

जब सोशल मीडिया में हरेक खासोआम ने इसका विरोध किया तो एक छोटा सा ट्वीट कर दिया कि, मेरे इस मज़ाक़िया ट्वीट से जिनको तकलीफ़ हुई, उसके लिये खेद है।

दरअसल इस तरह के विवादास्पद ट्वीट या वक्तव्य देकर हाशिये पर गये नेता सुर्ख़ियाँ बटोरने की चाहत के तहत अक्सर ऐसी कारगुज़ारियाँ करते हैं। जनभावनाओं का मज़ाक़ उड़ाकर, किसी के उपनाम को तोड़-मरोड़कर, सरकार के मंत्रियों पर व्यक्तिगत लांछन लगाकर या सबसे ज़्यादा चलन में है धार्मिक भावनाओं का मज़ाक़ उड़ाकर। ये चंद बेहद आज़माये हुए नुस्ख़े हैं, जिनका गाहे-बगाहे इस्तेमाल कर अपनी ठंडी पड़ी राजनीतिक चुल्हे में आँच सुलगाते हैं। जन भावनाओं के उफान लेने पर बड़ी ही बेशर्मी से एक छोटा सा माफ़ी उछाल देते हैं। उनका मंतव्य तो पूरा जो हो चुका होता है, पूरे देश का मीडिया उनकी बातों पर बहस कर रहा होता है,कई हैशटैग जारी हो जाते हैं, लोगों की ज़ुबान पर उनकी कारगुज़ारियों के चर्चे होते हैं।

पर राजनीति क्या इतने निम्न स्तर तक उतर आई है? जवाब है ‘हाँ ‘। जब आपकी पार्टी सत्ता में रहने पर सिर्फ़ काली कारगुज़ारियों में व्यस्त हो, आपके पास शीर्षस्थ नेतृत्व के नाम पर एक बड़ा सा बोझ का टोकरा हो (जिसे वंशवाद के नाम पर ढोना ही है), जनता का विश्वास हाथ से फिसल गया हो ; फिर तो यही सब रास्ता बचता है। ये तो ख़ुशी के अतिरेक में झूमते भारत को ‘चिल्लर’ सरीखे बयानबाज़ी से अचंभित कर सकते हैं, कि अनेक लोगों को पूछना पड़ जाता है कि ‘आपका स्तर इतना निम्न कैसे हो सकता है ?’ जबकि किसी भी पब्लिक फ़िगर के हरेक शब्द, बात करने के लहजे और व्यवहार की बेहद बारीक मीमांसा होती है। उसपर मज़ाक़ करने की सीमा का उल्लंघन बेहद शर्मसार करने वाली बात होती है।

पर ये नहीं सुधरेंगें, क्योंकि ये सब जान-बूझकर की गई कुचेष्टा है। मोदी सरकार के विरोध करने के नाम पर कुछ भी कर गुज़रते हैं ये लोग । पर जनता बेहद समझदार हो गई है, इनके मानसिक दिवालियेपन पर करारा जवाब भी देती है और बार-बार अपने को शाबाशी कि अच्छा किया कि इनसे पीछा छुड़ाया । उनके लिये ये सुर्ख़ियाँ बटोरने का मौक़ा है, हमारे लिये उनकी असली चेहरों की पहचान का मौक़ा।

“तुम गिरने की हद तय कर लो,

हर हद को तय करने की हमने ठानी है।

तुम शालीनता की सीमा को छूकर तो देख लो,

रोकने को मिलेगा हर सच्चा हिंदुस्तानी है ।”


जया रंजन @JayaRjs

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