सवाल $400 बिलियन का

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इतिहास में पहली बार भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $400 billion पार गया है। विगत चार सालों में मुद्रा भंडार में क़रीब 50% की बढ़त दर्शाता है कि भारत की भुगतान देय आधारभूत शक्ति बेहद स्थिर हो गई है। इस स्थिरता को 2014 से मज़बूती मिल रही है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), FII और NRI Investments के भरपूर निवेश से।

मुद्रा भंडार में आई इस उछाल से दो प्रश्न उभरते हैं। पहला, क्या भारत को ज़रूरत है इतनी तादाद में विदेशी मुद्रा भंडार की,जो US treasury bonds के रूप में हों और सालाना 1% की दर से ही ब्याज देते हों ? दूसरा, इस भंडार का सदुपयोग अधिकता से कैसे हो ?

वर्तमान समय में इस मुद्रा भंडार से क़रीब 10.5 महीनों तक हम आयात कर सकते हैं। इसकी तुलना में 1991 में हुए मुद्रा भुगतान संकट के दौरान केवल कुछेक हफ़्तों तक ही आयात करने लायक जमाराशि थी। विदेशी मुद्रा भंडार को अनिवार्य रूप से current account deficit (CAD) घाटे की भरपाई करनी चाहिये। भारत में यह घाटा फिस्कल इयर 18 (FY18) में सालाना क़रीब $120 billion या सामान्य GDP से 5% से थोड़ा ज़्यादा है। साफ़ है कि भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार इस बुनियादी आवश्यकता से कहीं ज़्यादा है। इस भंडार से ‘रूपये’ को भी मज़बूती व स्थिरता मिलती है। वैसे 1992 से रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने रूपये को डॉलर के ख़रीद-फ़रोख़्त से हुई अचानक गिरावट से बचाने हेतु लचीला विनिमय दर नीति बनायी है।
बार-बार चीन की ओर ध्यान इंगित होता है,जिसका CAD पॉज़िटिव है ,फिर भी $3 trillion विदेशी मुद्रा भंडार है। बीजिंग के मुद्रा भंडार में $3.8 trillion की उच्चता से $3.1 trillion की गिरावट आई है। इसमें से, $800 billion चीन की स्वायत्त धन नीति का हिस्सा है। चीन का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग $2.2 trillion है, जिसकी भारत के मुद्रा भंडार से अगर हम तुलना करें तो क़रीबन पाँच गुना बड़ा और इतना विशाल कि दो बड़ी संपन्न अर्थव्यवस्था को समाये हुए है।
दूसरा सवाल ज़्यादा गंभीर है : भारत के मुद्रा भंडार का सदुपयोग कैसे करें ? US treasury bond के रूप में निहित भंडार से सालाना 1% की दर से मिलने वाले ब्याज राशि $4 billion (₹26,000 करोड़ ) से मनरेगा (MNREGA) के लिये भी पैसे कम पड़ते हैं। अभी भारतीय नीति निर्माता दुविधा में हैं कि निवेश को प्रोत्साहन दिया जाये या वित्तीय दूरदर्शिता बनायी रखी जाये। वित्त मंत्रालय का वादा कि 3.20 % वित्तीय घाटा राशि का उल्लंघन नहीं किया जायेगा, भी परेशानी का सबब बन गया है। हालाँकि सरकार को लाभदायक व्यय के उपायों में तेज़ी लाने होगी और एक सुस्थिर तरीक़ा निश्चित करना होगा ख़र्च और सेवन का, आपूर्ति और माँग का। तभी संपूर्ण निवेश में 33-35% की उछाल आयेगी जो अभी गिरकर 30% हो गया है।

थोड़ी गणना करते हैं : भारत के ऊपर कुल क़र्ज़ (आंतरिक और बाह्य) $1.20 trillion (₹75 लाख करोड़ ) है। केंद्रीय बजट 2017-18 के अनुसार इस क़र्ज़ पर सालाना ब्याज देय है ₹5.23 लाख करोड़ । इसका मतलब है कि कुल क़र्ज़ राशि पर भारत औसतन 6.5% की दर से ब्याज चुकाता है, जिसमें 7.5% भारतीय रूपये का क़र्ज़ (Indian rupee debt) भी है।

ये बजट पर बहुत बोझ डालता है। सालाना ब्याज बहिर्वाह ज़्यादा है, उदाहरण के तौर पर, रक्षा बजट (₹2.62 लाख करोड़ ) , स्वास्थ्य-सेवायें और शिक्षा बजट को क़तर-ब्यौंत कर भारत के राष्ट्रीय क़र्ज़ को चुकता किया जाता है। यह बेहद हास्यास्पद है कि सालाना बजट 2017-18 के ₹21.47 लाख करोड़ राशि का 25% ख़र्च किया जायेगा क़र्ज़ चुकाने में,जो पिछली सरकारों ने बेवजह लिया,जिससे सामाजिक क्षेत्रों के लिये विकास कार्यों में शिथिलता आती है।

इसके लिये प्रमुख तीन उपाय हैं, जिनका क्रियान्वयन कर सरकार इस समस्या को कम कर सकती है : विदेशी मुद्रा भंडार का सही इस्तेमाल आधारिक संरचना के निर्माण में हो, क़र्ज़ राशि का बहिर्वाह कम हो और राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 3.20 % पर बनाये रखें।

  1. सर्वप्रथम $400 billion के एक हिस्से को स्वायत्त धन निधि में परिणत करें - ठीक वैसे ही जैसे चीन ने किया है। यदि स्वायत्त निधि का प्रारंभिक कोष $100 billion (₹6.50 लाख करोड़ ) है,तो यह राशि आधारिक संरचना (infrastructure ) के निर्माण में निवेश करनी चाहिये,जिससे सालाना 10% की आय हो। ये US treasury bonds के 1% सालाना ब्याज की तुलना में बेहद लाभकारी है। हाँ, आधारिक संरचना को बजट में आवंटन से मुक्त रखना चाहिये। इससे राजकोषीय घाटे का तय मानक 3.20% को बनाये रखने में आसानी होगी। आधारिक संरचना, स्वास्थ्य- सेवायें और शिक्षा आदि के क्षेत्रों में ₹6.50 लाख करोड़ के निवेश से व्यय में तेज़ी,नौकरियों की बढ़ोतरी और ख़र्च व सेवन में उछाल आयेगी।
  2. रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के ब्याज दर को 100 आधार अंक पर कम किये जायें।देश के सबसे बड़े ‘रूपये’ के क़र्ज़दार यानी भारत सरकार तुरंत 1% अपनी घरेलू मुद्रा के क़र्ज़ के ऊपर (क़रीबन 50 लाख करोड़ ) बचत कर लेगी। ये सीधे-सीधे 50 लाख करोड़ की सालाना बचत है,जिससे राजकोषीय घाटे में 0.3% की कमी आ जायेगी।
  3. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) का त्वरित गति से विनिवेश हो। दर्जनों ऐसे उपक्रम (होटल, एयरलाइन्स आदि) हैं जिनका पूर्ण विनिवेश लाभदायक उपक्रम में किया जाये। एक आवर्ती लक्ष्य ₹1 लाख करोड़ सालाना संभव है, जिससे सामाजिक क्षेत्रों में ख़र्च करने हेतु अधिक राशि सरकार दे पायेगी बिना राजकोषीय घाटे को बढ़ाये बग़ैर ।

विगत कुछ महीनों में रूपये में डॉलर के मुक़ाबले क़रीब 6% की बढ़त हुई है, जिसका सिर्फ़ एक ही कारण है कि विदेशी निवेशकों ने अधिक लाभ हेतु भारत का रूख किया है। जापानी और स्विस सेंट्रल बैंक क़रीब-क़रीब शून्य या निगेटिव ब्याज दे रहे हैं बचत राशि पर। US और यूरोपियन सेंट्रल बैंकों ने 1% से 1.5% ऑफ़र कर रहे हैं,बावजूद इसके कि यू एस फेडरल रिज़र्व ने तय किया था कि वैश्विक आर्थिक विकास को स्थिरता देने हेतु ब्याज राशि को बढ़ाई जाये।

भारत प्रधान ऋण पर 6% लाभ प्रस्तावित करता है।’रूपये’ की स्थिरता और मुद्रास्फीति की मध्यस्थता के कारण यू एस,यूरोपियन और जापानी निवेशक क़तार बनाकर खड़े हैं भारत में निवेश करने की ख़ातिर ।अत: हालिया भुगतान देय में इज़ाफ़ा और अन्य मुद्राओं की तुलना में ‘रूपये’ की मज़बूती इसी कारण दिखती है। ये तथ्य कि सितंबर 2017 में निर्यात में 26% की बढ़ोतरी (जब रूपया डॉलर के मुक़ाबले 64 था), सितंबर 2016 (जब रूपया डॉलर के मुक़ाबले 68 था) इस मिथ को ख़ारिज करता है कि कमज़ोर रूपया निर्यात को बढ़ाने में मदद करता है। उत्पादकता, गुणवत्ता और वितरण निर्यात वृद्धि को बढ़ाता है ना कि कमज़ोर रूपया।
नोटबंदी और जी एस टी (GST) से उत्पन्न विघटन अब ख़त्म हो चली है, भारत के नीति निर्माताओं को अब पूरा ध्यान राजकोषीय सुधार पर केंद्रित करना चाहिये। प्रमुखता से एक बेहतरीन राह निकालनी चाहिये, जिससे $400 billion के विदेशी मुद्राभंडार का सदुपयोग हो। जिस हिसाब से अभिवृद्धि दर में बढ़ोतरी हो रही है, 2019 तक इस भंडार के $500 billion तक बढ़ने की संभावना है।ये एक साथ चुनौती और मौक़ा दोनों का परिचायक है।

Minhaz Merchant @MinhazMerchant

Author: Minhaz is a Veteran of Indian Print Media. A highly acclaimed Author, Biographer, Editor and Columnist. Biographer of Rajiv Gandhi & Aditya Birla. Founder Sterling News Papers acquired by Indian Express. Author: The New Clash of Civilizations. Advisor to Republic TV.

 

This Article was Published in Business World. http://businessworld.in/article/The-400-Billion-Question/06-11-2017-130635/

Hindi Translation: Jaya Ranjan @JayaRJS

 

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