स्वर्ण-आभूषणों का मानक : पारंपरिक व्यवस्था से आजतक का प्रारूप

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पिछले बरस Josh Crumb और मैंने तीन सप्ताह चीन और भारत में बिताया। वहाँ के स्वर्ण-उद्योग के प्रमुख परिवारों से मिले न्यौते को पाकर मेहमान बन हम जा पहुँचे ।भारत में हमें न्यौता देने वाले परिवार का ‘गोल्ड-बुलियन ट्रेडिंग’ का व्यवसाय है।चीन में हमें न्यौतने वाले परिवार ‘Chow Tai Fook’ के मालिक का देश का सबसे बड़ा स्वर्ण व्यवसाय है।

इस दौरे में हमने सबसे ज़्यादा समय लोकल स्वर्ण-आभूषण मार्केट पर अध्ययन में बिताया। हम फ़ैक्टरी, बाज़ार, डीलर्स, निर्माता और स्वर्ण-आभूषणों को वित्तीय सहायता देने वाले फर्मस में भी गये।
तीसरे दिन से ही हमें पता चलने लगा था कि ये वो ज्वैलरी नहीं है,जिसके बारे में हम ‘पश्चिमी-देशों’ में जानते आये हैं। हमने पाया कि ये स्वर्णाभूषण 24K (99.99%)  या 22K (92%) के ख़ालिस सोने से बने हैं, जबकि पश्चिमी देशों में मैंने किसी भी आभूषण को 18K (75%) से ज़्यादा शुद्धता का नहीं पाया।

पूरब में स्वर्ण-व्यवसाय का ये पूरा तंत्र विशुद्ध सोने की चाह के इर्द-गिर्द रचा गया है, यहां एक फलता-फूलता समानांतर वित्तीय अर्थ-व्यवस्था है। जिसके तहत financing, lending और layaways firms ने चीन और भारत के क़रीब 2 बिलियन लोगों की $2 trillion राशि की स्वर्ण आभूषणों की चाहत पूरी की है।भारत में $4 billion के Publicly Listed entity (Muthoot Finance) का व्यापार ही स्वर्ण के बदले लोन देने पर आधारित है।इसके पूरे भारत में 4000 शाखायें हैं।250 tonnes सोने के आभूषणों ($10 billion)  के बदले क़र्ज़ देकर Muthoot प्रांतीय क्षेत्रों में एक बेहद बड़ा वित्तीय संस्थान हो गया है।

सबसे प्रभावित करने वाली बात,इस स्वर्ण-आभूषण व्यवसाय की पूरी अर्थ-व्यवस्था एक नियम-बद्ध तरीक़े से संचालित तो नहीं है पर इसमें ईमानदारी का बोलबाला है।हज़ारों बरसों से चले आ रहे इस व्यवसाय ने समय के साथ ख़ुद को बदला है, पर अपनी ख़ासियत को बरक़रार रखा है।हम जहाँ भी गये,जिस स्वर्णकार, आभूषण निर्माता या क़र्ज़दाता के पास गये,हर जगह इस ‘शुद्ध सोने’ को ख़रीदने या बेचने का एक ही बेहद आसान फ़ॉर्मूला है : (सोने की  शुद्धता x सोने का वज़न xसोने का डेली भाव) +7-10% मेकिंग चार्ज ।मैं यह देख आश्चर्यचकित था कि कितना पारदर्शी तरीक़ा है ये,जहाँ अमीर-ग़रीब, बुज़ुर्ग -युवा ख़रीदार हों,सब इस भाव से ख़रीदते हैं मानों आभूषण नहीं अपना प्रिय धातु स्वर्ण जमा कर रहे हों।

इन देशों के लोग US Dollars या अन्य महँगे currencies आसानी से ख़रीद-फ़रोख़्त नहीं सकते।सोने की छवि इतनी स्पष्ट है कि भारतीय  व चीनी लोग शादी-ब्याह में दहेज के तौर पर सोने की ख़रीदगी पारंपरिक तौर पर करते हैं। इस स्वर्णाभूषण ख़रीदारी के कारण  विकसित देशों की तुलना में इन देशों का मध्यम वर्ग बेहद समृद्ध है। इस यात्रा के दौरान ही Josh और मुझे ये पता चला कि पूरब के देशों में प्रचलित शुद्ध सोने के आभूषण ही इस ख़रीदारी का सही मानक स्तर है। स्वर्ण-आभूषण के ख़रीद-फ़रोख़्त की ये परंपरा पूरब के देशों में क़रीब 10000 साल पुरानी है।ये आभूषण उनकी सुदृढ़ जमापूंजी है, जिसका समाज में मान-सम्मान,पीढ़ियों के लिये बचत के लिये इस्तेमाल होता था।

आभूषण का इतिहास - सोने का सही मानक

Gold (Au) हमेशा से लोगों का पसंदीदा धातु रहा है,इसकी उपलब्धता तो कम है पर इसकी दुर्लभता व अक्षयता इसे सबका प्रिय बनाता है।सामाजिक सहयोगिता की प्रणाली में सामान,सेवा व कार्य-कौशल के बदले कुछ वस्तु की आवश्यकता होती है,पर ये वस्तु-विनिमय भौगोलिक दशाओं और मानक स्तर पर हमेशा सही नहीं होते। पर सोना अपनी बेहतरीन गुणों व चिर-स्थायी होने के कारण सदियों से वस्तु-विनिमय में हमेशा सर्वोच्च रहता आया है।

सोने की अद्भुत ख़ासियत जानने के लिये हमें चारों विषय : Physics, Economics, Geology और Anthropology में गहन जानकारी रखनी पड़ेगी । पुरातन काल से मनुष्य इन विषयों की विस्तृत जानकारी रखता था, ये आधुनिककाल में ही शिक्षा की कमज़ोरी है कि Economics के प्रोफ़ेसर को Geology की ख़ास जानकारी नहीं होती है। इस जानकारी के अभाव में उसे बताना पड़ता है कि सोने के हर ग्राम को ज़मीन से निकालने में लगे समय,ऊर्जा व लेबर में 5000 ग्राम ताँबा निकाल सकते हैं । ये सारे तथ्य बहुत ख़ास हैं क्योंकि आधुनिक काल के ज़्यादातर शिक्षाविद की पारंपरिक बुद्धिमता ‘स्वर्ण धातु’ की चमक-दमक में कहीं गुम सी गई है; उनका मानना है कि सोने का मूल्य उसका स्वाभाविक मूल्य नहीं बल्कि बाज़ार का तयशुदा
भाव है।सोने के मान व भाव को व्यर्थ करते वे यह कहने से भी नहीं चूकते कि सोने के आभूषण श्रृंगार के काम आते हैं सो उसका व्यक्तिपरक भाव व रूप-रंग है। जबकि वास्तविकता में स्वर्ण-आभूषण मार्केट के प्रयोगसिद्ध स्टडी से सोने की स्वाभाविक मोल का सुस्पष्ट तस्वीर निकलती है।ये आभूषण जिन्हें हम श्रृंगार हेतु पहनते हैं, वो व्यक्तिपरक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि धन के रूप में ज़्यादातर करके ख़रीदा जाता है,क्योंकि सोना चिरस्थायी होता है।

सोना व्यवसाय में सिर्फ़ एक ही शुद्धता का मानक है; वही पारंपरिक व्यवस्था जिससे मेसोपोटामिया काल से आजतक ख़रीद-विक्रय होती आ रही है।हमने पाया कि कुछेक सरकारी-मान्यता प्राप्त सोने के तय मानक हैं,जहाँ मुद्रा की दर ठोस सोने (US Gold Standard में आंशिक रूप से या इतिहास में अन्य अवसरों पर 100% रूप में) से तय होती है, ताकि वैश्विक स्वर्णाभूषण मानक से कमतर ना रहे। विचारों की कड़ी में आगे पाया कि : सोना इतिहास में कभी मुद्रीकृत व विमुद्रिकृत नहीं हुआ क्योंकि सरकारों ने कहा; सोना सदैव से जन साधारण के पास आभूषणों के रूप में पाया गया है। ये सरकारों की वित्तीय दूरदर्शिता थी कि समृद्धि बनाये रखने व अपनी मुद्रा का भाव बनाये रखने हेतु स्वर्ण भंडार बनाये रखा ।

ये पारंपरिक स्वर्ण व्यवसाय का तरीक़ा जो पूरब में प्रचलित है,वो क़रीब-क़रीब 10000 सालों से बिना किसी बदलाव के चलता आ रहा है। ब्राज़ील ,रूस,भारत,चीन,मलेशिया ,इंडोनेशिया ,फ़िलीपींस  थाईलैंड ,वियतनाम,पाकिस्तान, UAE, सिंगापुर, सउदी अरब आदि देशों में साधारण ज्वैलरी भी इस तरह बेची जाती है कि ख़रीदारी का 90%  मुल्य शुद्ध सोने का दाम होता है और केवल 10% राशि नग व डिज़ाइन पर ख़र्च होते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो अगर आपने एक अँगूठी 1000₹ में ख़रीदा है तो दुकान से बाहर आते वक़्त आपके पास 900₹ मूल्य का शुद्ध सोना होता है। ये 900₹ आपकी बचत है ,जिसे आप किसी अपने को दे सकते हैं,बेच सकते हैं या इसे गिरवी रख क़र्ज़ ले सकते हैं। इस समाज में स्वर्ण-आभूषण का बेहद महत्व है, जिससे आड़े वक़्त में रोटी,कपड़ा और मकान तक ख़रीद सकते हैं; और तो और ज़मीन-जायदाद तक ख़रीदे जाते हैं।

वहीं पश्चिमी देशों जैसे अमेरिका,फ्रांस,ऑस्ट्रेलिया,स्पेन,इटली और ब्रिटेन में कहानी बिलकुल जुदा है ;जहाँ पिछले 50 सालों में आभूषणों की असल परिभाषा और विशिष्ट धातुओं के संयोजन से बनने वाले आभूषणों के बीच का तारतम्य टूटता जा रहा है।असल सोने का भाव ख़रीद की तुलना में कमतर होता जा रहा है।
पश्चिमी देशों में साधारण आभूषण की ख़रीद में क़रीब 90% उसमें जड़े नगीनों,उसकी डिज़ाइन के लिये जा रहे हैं,जबकि केवल 10% शुद्ध सोने का भाव शामिल होता है।इसलिये पश्चिमी देशों में ख़रीदे गये ज़्यादातर गहनों की क़ीमत ख़रीदारी के तुरंत बाद ही नगण्य हो जाता है। उदाहरण के लिये :एक पश्चिमी ज्वैलरी का ख़रीदार $1000 में एक अँगूठी ख़रीदता है जिसमें सोने का कुल मोल क़रीब $100 की ही होती है।

ज्वेलरी उद्योग : कहानी पूरब और पश्चिम की

हर साल क़रीब $310 billion मूल्य के आभूषण लगभग 1 billion परिवारों द्वारा ख़रीदे जाते हैं और यह बाज़ार 5% के आस-पास हर साल पूरे विश्व में बढ़ता ही जा रहा है।ये बढ़ोतरी तक़रीबन $1 million प्रति मिनट का है। इस बाज़ार का पैमाना इतना वृहद होने के कारण Google,Facebook,Twitter,Tencent पर भी विज्ञापनों  से ज्वैलरी मार्केट के कुल आधे $170 billion सालाना कमाई हो जाती है।

इस $310 billion के ज्वेलरी मार्केट में,तक़रीबन $130 billion (2,600 tonnes) ही शुद्ध सोने का कारोबार होता है। जो कि पूरे व्यापार का आधा भी नहीं है।पूरी बात समझने के लिये हमें $310 billion के ज्वैलरी व्यापार को दो मार्केट्स में बाँट देते हैं: पूरब और पश्चिम पश्चिमी बाज़ार मे $180 billion के ज्वैलरी  हर साल ख़रीदे जाते हैं,जिसमें सोने का मूल्य सिर्फ़ $13 billion ही होता है; तभी इन गहनों के 90% भाव ख़रीदने के बाद ही ख़त्म हो जाती है,जिससे उसका रिसेल भाव नगण्य है। वहीं पूरब के बाज़ारों में $130 billion के गहने हर साल ख़रीदे जाते हैं,जिसमें सोने का मूल्य $117 billion होता है। ये सोना मुद्रा भाव को स्थिर रखने में काम आता है।इससे ‘ज्वैलरी व्यापार’ को भी मज़बूती मिलती है, जो दुनिया के करोड़ों लोगों के बचत,क़र्ज़ -विनिमेय और भौगोलिक दूरियों को पाटकर वैल्यू-एक्सचेंज के काम आता है।

पश्चिमी उपभोक्ताओं की इस ख़रीद-फ़रोख़्त में हाथ ख़ाली ही रह जाती है,काफ़ी नुक़सानदायक ख़रीदारी है ये।इसका समाधान हो सकता है,अगर ज्वैलरी के मूल्य के इतिहास का आकलन किया जाय।अगर हम Tiffany & Co.’s के वार्षिक “Blue Book” का विश्लेषण करें जो 100 सालों से भी ज़्यादा समय से प्रकाशित हो रही है, आसानी से दिखता है कि फ़ाईन ज्वैलरी के मूल्य और पश्चिम में सोने के मूल्य का ratio गिरता ही जा रहा है। वही ratio जो पुरातन काल से स्थिर था,पर पिछले 50 बरसों से गिरता ही जा रहा है।

ज्वैलरी ख़रीदार पूरब के देशों मे : वज़न और शुद्धता कितना है ? सोने का आज का भाव क्या है ?
ज्वैलरी ख़रीदार पश्चिम के देशों में : खुदरा भाव क्या है ?

पहले मैं भी मानता था कि गहनों में सोने का एक टुकड़ा भर है और ये फ़ैशन की चीज़ है।सोना को बहुमूल्य वस्तु के रूप में संजोना यानी बुलियन मार्केट में मॉनेटरी सोना ख़रीदना और डॉलर के बढ़ते भाव पर बेचना । एशिया के देशों के इस दौरे पर सोने के गहनों के व्यापार पर गहन अध्ययन ने साबित किया कि मेरी धारणा कितनी त्रुटिपूर्ण है।सोने के गहनों में सोने के भाव का 90% हिस्सेदारी इसे महज़ आभूषण नहीं बल्कि शुद्ध सोने के रूप में की गई एक बचत बनाती है। सोने के खानों से सोने ज्वैलरी उद्योग में भेजे जा रहे हैं।दो अवधारणाओं को मिलाते हैं: सोने की माँग निरंतर रहने का कारण गहनों केरूप में की गई बचत है ; ये माँग ही बुलियन मार्केट और सोने के खदानों को मज़बूती देती है। सोने का भौतिक स्वरूप आधुनिक इकोनॉमिक्स में हर उतार-चढ़ाव में स्थिरता देता है, पर वास्तव में पुरातन काल से ही स्वर्ण-आभूषण व्यवसाय ने ही इसके स्तर व चमक को बरक़रार रखा है।

 

Hindi Translation: जया रंजन @JayaRjs

 

Author: 

Roy Sebag @goldmoney Contrarian thinker and wisdom-seeker in the realms of economics, history, philosophy, and physics. Founder: Goldmoney Inc and CEO: GoldMoney Inc.

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